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كاش يك كبوتر بودم. |
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| پر و بالم را، |
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| مي سپردم به دستان نسيم؛ |
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| با دلي سرشار از عشق و اميد |
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| مي پريدم سوي دياري آشنا، |
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| من، از اين غربت بي روح و پر از ناله و عصيان و جفا، |
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| تا به آن جا كه دگر هيچ كسي |
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| قلب كوچك گل عشق را |
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| زير پاهاي دلش له نكند، |
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| تا به آن جا كه دگر هيچ كسي غم نخورد، |
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كاش عمر خوشي اين قدر كوتاه نبود؛ |
به محبت، به وفا شك نكند. |
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يا دلم از ديدن روي چو مهتاب تو بي تاب نبود. |
پس كجا بود كسي كه دم از عشق و محبت مي زد؛ |
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كاش مي شد لحظه اي |
پس كجا بود كسي كه دلش بر خنده و شادي تو پر مي زد. |
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پاي صحبت اقاقيا نشست؛ |
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چون كه او هم عاشق
است |
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| من به تاريكي شب ها نمي انديشم؛ |
درد هجران ديده است. |
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| من به زيبايي مهتاب و شكوفايي روز |
كاش مي شد تا ابد پروانه بود، |
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| و به تك لحظه ي ديدار تو مي انديشم. |
تا ابد هم در كنار شمع سوخت. |
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| بله من، |
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| به تك لحظه ي ديدار تو مي انديشم. |
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